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डॉ. कविता वाचक्नवी: भारत की छवि

तमाम प्रगति और तरक्की के दावों के बावज़ूद भारत की छवि दुनिया भर में कूड़े-कचरे से भरे देश की बन रही है

डॉ. कविता वाचक्नवी का लेख २१/१० /२०१२ के जनसत्ता की रविवारीय मेंमहानगरों और नगरों में पसरी गंदगी तो लाइलाज़ हो चुकी है . यहाँ तक कि मनोरम पर्यटन और तीर्थस्थल भी साफ़ सुथरे नहीं रह गये . देश में पनप रहे इस नये खतरे का जायजा लेता हुआ  डॉ. कविता वाचक्नवी का लेख २१/१० /२०१२ के जनसत्ता की रविवारीय में 

भारत : खतरे की कगार और विस्फोट के ढेर पर

 (डॉ.) कविता वाचक्नवी 

कल ही एक लेख व समाचार पढ़ रही थी, जिसमें बैंगलोर में कचरे के प्रबंधन से जुड़े, महापालिका के एक सकारात्मक निर्णय की जानकारी साझा की गई थी व जिसमें बताया गया था कि “कूड़े को हमें अब अपने घर में ही अलग करना होगा, महापालिका के कर्मचारी उन्हें उसी रूप में एकत्र करेंगे, आपके द्वारा ऐसा नहीं करने में आपका कूड़ा स्वीकार नहीं किया जायेगा। निश्चय ही यह बड़ा प्रभावी निर्णय है, नागरिकों को कार्य अधिक करना पड़ेगा, महापालिका को कार्य अधिक करना होगा, पर नगर स्वच्छ रहेगा। उपरोक्त नियम अक्टूबर माह से लागू हो जायेंगे “

महापालिका के इस निर्णय को पढ़ने के पश्चात् अच्छा लगा किन्तु उस निर्णय की खामियों और सहायक घटकों के अधूरेपन के चलते सरकार का वह निर्णय किस तरह थोथा रह जाने वाला है, यह विचार भी आया और इस प्रकार इस लेख की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

विदेशों (विशेषतः योरप, अमेरिका व विकसित देशों ) में कचरे/कूड़े की व्यवस्था बहुत बढ़िया ढंग से होती ही है। प्रत्येक परिवार के पास काऊन्सिल के Bins and waste collection विभाग की ओर से बड़े आकार के 3 Waste Bins मुख्यतः मिले हुए होते हैं, जो घर के बाहर, लॉन में एक ओर अथवा गैरेज या मुख्यद्वार के आसपास कहीं रखे रहते हैं। परिवार स्वयं अपने घर के भीतर रखे दूसरे छोटे कूड़ेदानों में अपने कचरे को तीन प्रकार से डालता रहता होता है अतः घर के भीतर भी कम से कम तीन तरह के कूड़ेदान होते हैं। एक ऑर्गैनिक कचरा, दूसरा `रि-साईकिल’ हो सकने वाला व तीसरा जो एकदम नितांत गंदगी है… जो न ऑर्गैनिक है व न `रि-साईकिल’ हो सकता है। सप्ताह में एक सुनिश्चित दिन विभाग की तीन तरह की गाड़ियाँ आती है, अतः उस से पहले (या भर जाने पर यथा इच्छा) अपने घर के भीतर के कूड़ेदानों से निकाल कर तीनों प्रकार के बाहर रखे Bins में स्थानांतरित कर देना होता है, जिसे वे निर्धारित दिन पर आकर एक-एक कर अलग-अलग ले जाती हैं।

इसके अतिरिक्त पुराने कपड़े, बिजली का सामान, पोलिथीन बैग्स, बैटरीज़ व घरेलू वस्तुओं (फर्नीचर, टीवी, इलेक्ट्रॉनिक सामग्री, जूते, काँच आदि ) को एक निश्चित स्थान पर पहुँचाने की ज़िम्मेदारी स्वयं व्यक्ति की होती है। बड़ी चीजों को कचरे में फेंकने के लिए उलटे शुल्क भी देना पड़ता है।

इस पूरी प्रक्रिया के चलते लोगों में कचरे के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता बनी रहती है। जबकि ध्यान देने की बात यह भी है कि योरोप आदि के देश ठंडे हैं व यहाँ ठंडक के कारण रासायनिक प्रक्रिया (केमिकल रिएक्शन) बहुत धीमे होता है अतः कचरा सड़ने की गति बहुत कम है, इसलिए भारत की तरह बदबू और रोगों का अनुपात भी कम। ऐसा होने के बावजूद विकसित देशों की कचरे के प्रति यह अत्यधिक जागरूकता देश के वातावरण व नागरिकों को ही नहीं अपितु पर्यावरण व प्रकृति को भी बहुत संबल देती है।

स्वच्छता का सबसे कारगर ढंग होता है कि गंदगी कम से कम की जाए। यदि एक व्यक्ति किसी स्थान पर दिन-भर कुछ न कुछ गिराता-फैलाता रहे व दूसरा व्यक्ति पूरा दिन झाड़ू लेकर वहाँ सफाई भी करता रहे, तब भी वह स्थान कभी साफ नहीं हो सकता। अतः स्वच्छता का पहला नियम ही यह है कि गंदगी कम से कम की जाए। इसे व्यवहार में लाने के लिए व्यक्ति-व्यक्ति में स्वच्छता का संस्कार व गंदगी के प्रति वितृष्णा का भाव उत्पन्न होना अनिवार्य है। आधुनिक उन्नत देशों में एक छोटा-सा बच्चा भी गंदगी न करने/फैलाने के प्रति इतना सचेत व प्रशिक्षित होता है कि देखते ही बनता है। मैंने डेढ़ वर्ष की आयु के बच्चे को उसके माता पिता द्वारा बच्चे द्वारा फैलाई फल आदि की गंदगी उठाकर दूर जाकर डिब्बे में डाल कर आने के लिए कहते व करते देखा है। अपने परिवेश के प्रति ऐसी चेतना भारतीय परिवारों में नाममात्र की है। वहाँ गंदगी तो परिवार व समाज का प्रत्येक सदस्य धड़ल्ले से फैला सकता है किन्तु सफाई का दायित्व बहुधा गृहणियों व सफाई कर्मचारियों का ही होता है। अतः सर्वप्रथम तो भारत में कचरा प्रबंधन के लिए लोगों में इस आदत के विरोध में जागरूकता पैदा करनी होगी कि स्वच्छता `सफाई करने’ से होती है। उन्हें यह संस्कार बचपन ही से ग्रहण करना होगा कि स्वच्छता `गंदगी न करने’ से होती है। ‘सफाई करने’ और ‘गंदगी न करने’ में बड़ा भारी अंतर है।

विकसित देशों की जिस व्यवस्था, सफाई, हरीतिमा, पर्यावरण की शुद्धता आदि की प्रशंसा होती है व जिसका आकर्षण आम भारतीय सहित किसी अन्य एशियाई (या इतर आदि) के मन में भी जगता है, वे लोग स्वयं भी संस्कार के रूप में अंकित, गंदगी फैलाते चले जाने वाले अपने अभ्यास से, विकसित देशों में रहने के बावजूद मुक्त नहीं हो पाते हैं और उन देशों की व्यवस्था को लुके-छिपे बिगाड़ते हैं। ऐसे लोग सार्वजनिक रूप से भले व्यवस्था भंग करने का दुस्साहस नहीं कर पाते, किन्तु अपने देश (यथा भारत आदि) लौटने पर पुनः आचरण में वही ढिलाई भी बरतते हैं।

अब रही कचरा प्रबंधन के तरीकों को अपनाए जाने की बात। यह `अपनाया जाना’ भारतीय परिवेश में (ऊपर बताए कारण के चलते भी ) बहुत संभव नहीं दीखता; क्योंकि लोग इस सारी ज़िम्मेदारी से बचने के लिए कचरे को नदी-नालों में फेंक देते हैं/देंगे। यह मानसिकता सबसे बड़ा अवरोध है किसी भी स्वच्छता के इच्छुक समाज, व्यवस्था, देश अथवा संस्था के लिए। दूसरा अवरोध एक और है। यहाँ विकसित देशों में प्रत्येक वस्तु और पदार्थ पैकेट/कंटेनर/कार्टन में बंद मिलते हैं और उस पर अंकित होता है कि उसकी पैकिंग व उस पदार्थ/वस्तु के किस-किस भाग को किस-किस कचरा-विभाग में डालना है। भारत में लोगों को कचरे के सही विभाग का यह निर्णय लेने के लिए न्यूनतम शिक्षा, जानकारी तथा जागरूकता तो चाहिए ही, साथ ही जीवन में प्रयुक्त होने वाली प्रत्येक वस्तु और उत्पाद से जुड़े घटकों पर यह अंकित होना निर्माण के समय से ही आवश्यक है कि उनका अंत क्या हो, कैसे हो, कहाँ हो। सरकार उत्पादनकर्ताओं पर ऐसा नियंत्रण व नियम लागू करेगी, यह अभी पूरी तरह असंभव है। जो उत्पाद खुले मिलते हैं, उनका विसर्जन कैसे होगा यह अलग नया विषय होगा।

बैंगलोर में कचरा प्रबंधन के लिए यद्यपि अच्छे निर्णय लिए गए हैं किन्तु इन सब कारकों के चलते वे निर्णय सही व पूरा फल दे पाएँगे, यह संदिग्ध ही नहीं, लगभग असंभव भी है। मुझे यह सब जल्दी संभव नहीं लगता कि ऐसा ठीक-ठीक आगामी 15-20 वर्षों में भी हो पाएगा।

भारत में जो लोग जागरूक व सचेत हैं वे अपने तईं कचरे का नियमन कर सकते हैं। हम जब भारत में थे तो ऑर्गैनिक कचरा (विशेष रूप से फल, सब्जी, अनाज व हरियाली आदि) को प्रतिदिन एक बैग में भर कर ले जाते थे व किसी पशु के आगे खाने को डाल देते थे। `रि-साईकिल’ हो सकने वाली प्रत्येक वस्तु को धो साफ कर एक बड़े ड्रम में अलग-अलग सम्हाल रखा करते थे व उन्हें प्रति माह कार में भरकर, ले जाकर कबाड़ी को सौंप देते थे। केवल हर तरह से व्यर्थ हो चुकी गंदगी-मात्र को ही कूड़ेदान में डाल कर फेंकते थे। लॉन आदि के बुहारे गए सूखे पत्तों को लॉन के एक सिरे पर इसी प्रयोजन से बने स्थान पर गहराई में डाल देते थे ताकि उनकी खाद बन सके।

अपने वातावरण के प्रति इतनी जागरूकता प्रत्येक में होनी ही चाहिए… वरना पूरे देश को कूड़े के ढेर में बदलने में समय ही कितना लगता है ? विदेश में रहने वालों के लिए इसीलिए भारत को देखना बहुधा असह्य हो जाता है व हास्यास्पद भी।

प्रकृति की ओर से जिस देश को सर्वाधिक संसाधन व रूप मिला है, प्रकृति ने जिसे सबसे अधिक सम्पन्न व तराशे हुए रूप के साथ बनाया है, वह देश यदि पूरा का पूरा आज हर जगह कचरे के ढेर में बदल चुका है, सड़ता दीखता है तो उसका पूरा दायित्व एक एक नागरिक का है।

वर्ष 2010 के अंत में हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में कुल्लू से 45 किलोमीटर दूर व मनाली से आगे पार्वती व व्यास नदियों के मध्य स्थित मणिकर्ण नामक अत्यधिक सुरम्य स्थल पर अत्यधिक उल्लास व चाव से गई थी, किन्तु कार से बाहर पाँव रखते ही ऐसा दृश्य था कि पाँव रखने का भी मन नहीं होता था… सब ओर गंदगी के अंबार… उफ़…उबकाई आ जाए ऐसी स्थिति दूर दूर तक थी । यह स्थल अपने गंधक के स्रोतों के कारण भी विश्वप्रसिद्ध है। नदी के एक किनारे पर स्थित पर्वत से खौलता हुआ `मिनरल वाटर’ बहता है जिसे नगर व होटलों आदि में स्नानादि के लिए भी धड़ल्ले से प्रयोग किया जाता है, जबकि उस पर्वत की तलहटी में बहती नदी का जल कल्पनातीत ढंग से बर्फ़ीला व हाड़ कंपा देने वाला है। धार्मिक स्थल के रूप में भी इसका बड़ा माहात्मय लोग सुनाते हैं।

किन्तु गंदगी में डूबी इस स्थल की प्राकृतिक संपदा व पर्यावरण की स्थिति को देख कर त्रस्त हो उठी थी। ऐसी ही स्थिति चामुंडा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज और धौलाधार पर्वतमाला के आसपास के अन्य क्षेत्रों में थी। ये वे क्षेत्र हैं जो प्राकृतिक सुषमा की दृष्टि से अद्भुत हैं और हमारे जलस्रोत यहाँ से प्रारम्भ होते हैं। मैंने प्रत्यक्ष देखा कि हमारी नदियाँ, हमारे जलस्रोत अपने स्रोत स्थल पर ही प्रदूषण व गंदगी से लबालब कर दिए जाते हैं। बाढ़ आदि विभीषिकाएँ कालांतर में इसी का प्रतिफल हैं। पॉलीथीन इत्यादि के प्रयोग व विसर्जन तथा `रि-साईकिल’ हो सकने वाली वस्तुओं को गंदगी में डाल/फेंक कर दो-तरफा हानि करने के अन्य भी अनेक भीषण दुष्परिणाम हैं। अतः वृक्षों की कटाई का एक बड़ा पक्ष भी इस से जुड़ा है।

जब हिमालय की तराई के क्षेत्रों की ( जहाँ जनसंख्या व उसका घनत्व कम है) यह स्थिति है तो भारत के नगरों की दयनीय स्थिति पर क्या लिखा जाए ! मेरे मस्तिष्क में इस समय ऐसा कोई उदाहरणीय नाम ही नहीं सूझ रहा जहाँ स्थिति दूभर न हो। उत्तर का हाल तो बेहद भयावह है, किन्तु दक्षिण भारत तुलना में स्वच्छ होते हुए भी ऐसे कुत्सित व कुरुचिपूर्ण दृश्य प्रस्तुत करता है कि उबकाई आ जाए। देश में विधिवत् सर्वाधिक स्वच्छ नगर की उपाधि पाने वाले हैदराबाद सिकंदराबाद जैसे महानगर के आधुनिक परिवेश वाले स्थलों पर भी गंदगी के अंबार लगे होते हैं। सार्वजनिक मूत्रालयों से `ओवर फ़्लो’ हो कर फ़र्लांग-भर दूरी तक पहुँचने वाली मूत्र की धाराएँ और हर एक कदम पर फेंकी गई थूकों का अंबार ऐसी वितृष्णा पैदा करते हैं कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। दुर्गंध व गंदगी से भभकते-खौलते सार्वजनिक कूड़ेदानों से बाहर तक फैली गंदगी में कुत्तों का मुँह मारते मचाया जाने वाला उत्पात असहनीय कहा जा सकता है।

इसी कूड़ा कचरा अव्यवस्था / अप्रबन्धन के चलते कचरा बीनने वाले बच्चों का जीवन नष्ट हो जाता है। इस बार दिल्ली में एक युवक ने सप्रमाण पुष्टि की कि जब उसने कॉलोनी में साफ सफाई के लिए अपने हाथ से स्वयं अभियान चलाया तो एक माफिया ने उसे जान से मार देने की धमकियाँ दीं; क्योंकि बच्चों को चुराने व चुरा कर उन्हें कचरे के ढेरों में झोंकने व फिर आगे कॉलोनियों में चोरी व हत्या आदि तक, इसी प्रक्रिया के माध्यम से सिरे तक पहुँचाए जाते हैं। पूरे अपराध- रैकेट इस से संबद्ध व इस पर केन्द्रित होकर गतिशील हैं। कितने जीवन भारतीयों की इस आदत व अ-नियमन से दाँव पर लगे होते हैं। दूसरी ओर यदि इसी कचरे का सही प्रबंध किया जाए तो देश को कितने प्राकृतिक उर्वरक मिल सकते हैं और `रि-साईकिल’ हो सकने वाली वस्तुओं के सही प्रयोग द्वारा कितनी राष्ट्रीय क्षति बचाई जा सकती है, इसका अनुमान हजार लाख में नहीं अपितु अरबों खरबों में लगाइये। पर्यावरण व प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा तथा उनके क्षय पर रोक भी लगेगी। स्वास्थ्य व जीवन रक्षक दवाओं पर होने वाला खर्च कम होगा, व्यक्ति का शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य उत्तरोत्तर सुधरेगा… विदेशी पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी और इससे विदेशी पूँजी भी। देश की छवि जो सुधरेगी वह एक अतिरिक्त लाभ।

एक-एक व्यक्ति के थोड़े-से उत्तरदायित्वपूर्ण हो जाने से कितने-कितने लाभ हो सकते हैं … यह स्पष्ट देखा जा सकता है। अन्यथा विधिवत् विदेशी साहित्य और अंतर-राष्ट्रीय स्तर की फिल्मों (ऑस्कर विजेता Slumdog Millionaire ) के साथ साथ मीडिया में समूचे भारत को `सार्वजनिक शौचालय’ माना/कहा जाता रहेगा। भावी पीढ़ियाँ कचरे के ढेर पर अपना जीवन बिताएँगी और उनके पास साँस लेने के लिए भी पर्याप्त साफ स्थान और वातावरण तक नहीं होगा। अच्छे स्थलों की खोज में कुछ अवधि के लिए धनी तो विदेश घूम आएँगे किन्तु मध्यमवर्ग व शेष समाज उसी त्राहि-त्राहि में जीवन जीने को शापित रहेगा। कचरे से उपजी विपदा के चलते भारत एक गंभीर खतरे की कगार और विस्फोट के ढेर पर बैठा है।

 सोचना आपको है, निर्णय आपका !! क्या देना चाहते हैं अपने बच्चों को विरासत में ? केवल कूड़े कचरे की विरासत और गंदगी का साम्राज्य !! जो स्वयं, कभी भी हो जाने वाले विस्फोट पर टिका है…. डॉ. कविता वाचक्नवी

 

 

यह लेख अविकल रूप से यहाँ वागर्थ पर प्रकाशित है

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4 comments on “डॉ. कविता वाचक्नवी: भारत की छवि

  1. धन्यवाद… आपने पूरा पेज कैसे निकाल लिया? मुझ से तो हुआ ही नहीं था।

  2. NARESH NAGPAL
    October 21, 2012

    SAB LOGOMAI JAGRITI ILANA,HAMAI APNAI KARTAVYAI KO SAMJNA CHAYAI ES MAI SADEV AAP KAI SATH -HAI

  3. जनसत्ता’ में प्रकाशित यह आलेख समाचार पत्र की सीमाओं (यथा लिंक आदि न दिए जा सकने) कई परिवर्तनों के साथ छपा है। जो मित्र पूरा लेख पढ़ना चाहें वे `वागर्थ’ के इस लिंक पर http://vaagartha.blogspot.co.uk/2012/10/Waste-disposal-and-waste-management.html पूरा लेख अविकल पढ़ सकते हैं ।

  4. जनसत्ता’ में प्रकाशित यह आलेख समाचार पत्र की सीमाओं (यथा लिंक आदि न दिए जा सकने) के चलते कई परिवर्तनों के साथ छपा है। जो मित्र पूरा लेख पढ़ना चाहें वे `वागर्थ’ के इस लिंक पर http://vaagartha.blogspot.co.uk/2012/10/Waste-disposal-and-waste-management.html पूरा लेख अविकल पढ़ सकते हैं ।

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