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कुंठित पुरुषवाद अजन्मी बेटियों को भी नहीं बख्शता-अरविन्द शेष


कुंठित पुरुषवाद अजन्मी बेटियों को भी नहीं बख्शता अरविन्द शेष

निष्ठा-बिष्ठा की तुकबंदी और गिदड़ा-गुड़कान…

कोई चाहे तो एक रिपोर्ट को “झूठ” मान कर “‘टाइम्स ऑफ इंडिया” पर मुकदमा कर सकता है, या फिर उसका शुक्रिया अदा कर सकता है कि उसने एक ऐसे सच से परदा उठा दिया, जिसके तले न जाने कैसे बदबूदार कीड़े बजबजा रहे हैं।

छह मई 2012 को अभिनेता आमिर खान के शो “सत्यमेव जयते” के ठीक एक दिन पहले कई दूसरे बड़े नामों के साथ फिल्म अभिनेता संजय दत्त के भी खयाल शाया हुए थे। अपनी बेटी त्रिशला के फिल्मों में काम करने के सवाल पर उनका कहना था- “…मेरी बहन और भांजी भी फिल्मों में काम कर सकती थी। लेकिन यह वह रास्ता नहीं है, जो मेरे पिता ने तैयार किया। …अपने परिवार में सबसे बड़ा होने के नाते मैं उस “वसीयत” को नहीं छोड़ सकता। …त्रिशला एक फोरेंसिक वैज्ञानिक है, बस! इससे ज्यादा कुछ नहीं। …मैं क्यों ऐसा चाहूंगा कि वह यहां आए और फिल्मों में अपने नितंब हिलाए?”

(कैसा लगता है उस वक्त जब संजय दत्त अपने से आधी या बेटी की उम्र की लड़कियों की कमर पर थाप देते हैं और अपना लोंदा-सा देह किसी भोंदे की तरह ठुलकाते हैं?)

बहरहाल, इसके जवाब में त्रिशला ने जो कहा, उसे उनके पिता संजय दत्त के खयाल के साथ मेरे इन कुछ बेवकूफाना खयालों को पढ़ते हुए ध्यान रखने की गुजारिश है। त्रिशला का कहना था- “…वे अपने काम और नए परिवार (नई पत्नी) के साथ व्यस्त हैं। लेकिन आखिरी तौर पर फैसला मेरा होगा। …मैं अपने पापा को बहुत प्यार करती हूं, लेकिन अगर उन्होंने मेरे फैसले का साथ नहीं दिया तो मेरा रास्ता अलग होगा।”

अपने छह मई के “सत्यमेव जयते” में आमिर खान जब कन्या भ्रूणहत्या के सवाल पर भारत के लोगों को ज़ार-ज़ार रुलाते हुए यह कह रहे थे कि ये मसला देश के अमीर और इलीट तबकों के बीच सबसे ज्यादा गंभीर है तो क्या इस संदर्भ में संजय दत्त और त्रिशला की बातों का घालमेल करने की कोई तुक हो सकती है? यह अपने आप में एक बेतुका सवाल है। सिर्फ तुकबंदी के शौक में अगर हम “निष्ठा” का मिलन “विष्ठा” से करा देते हैं तो सिवाय बदबू के कुछ और हासिल नहीं, लेकिन थोड़ी मेहनत कर “निष्ठा” में “प्रतिष्ठा” की तुक घोलें तो निश्चित तौर पर उसमें से “मिष्ठा” की खुशबू आएगी। खैर, तुकबंदी दरअसल “गिदड़ा-गुड़कान” टाइप का एक खेल भर है, जो आपकी काबिलियत के साथ-साथ कलाकारी के सहारे आगे बढ़ता है।

मैजोकिज़्म की मासूमियत…

आमिर खान को “सत्यमेव जयते” के लिए बधाई इसलिए दिया जाना चाहिए, क्योंकि मार्कंडेय काटजू के खयालों को तोड़-मरोड़ कर कहूं तो ये कि नब्बे फीसदी भारतीयों के सोचने-समझने का दर्जा औसत से भी नीचे हैं। मैं उनके लफ़्जों में नहीं कहूंगा कि नब्बे फीसद भारतीय मूर्ख हैं, क्योंकि मैं मानता हूं कि कोई भी समाज अपनी सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रियाओं की वजह से अपने चेहरा हासिल करता है। इसलिए मुझे लगता है कि उंगली उठा कर सबको मूर्ख कहने के बजाय मूर्ख होने की वजहों के बारे में भी इतनी ही हिम्मत के साथ बात की जानी चाहिए।

लेकिन जिस संस्कृति की बुनियाद ही “मैजोकिज़्म” पर टिकी हो, उसमें यह उम्मीद निहायत मासूम-सी लगती है कि कोई व्यक्ति सामने घट रही तमाम चीजों को विश्लेषण के नजरिए से देखेगा। आमिर खान को अक्सर इसी का फायदा मिलता है।

“सत्यमेव जयते” के पहले अंक के पहले यह खबर सचमुच आम नहीं थी कि गर्भ में लिंग जांच के लिए अल्ट्रासाउंड या सोनोग्राफी की शुरुआत खुद सरकार ने की थी। लेकिन उसके खिलाफ लड़ाई के नतीजे में बने पीएनडीटी एक्ट, 1994 और उसके बाद सरकारी और गैरसरकारी पैमाने पर कन्याभ्रूण हत्या पर पूरी तरह रोक के अभियान इतने भी अनजाने नहीं रहे। इसके बावजूद कि बाजार और चिकित्सा क्षेत्र की लॉबियों ने उन अभियानों को बेअसर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अक्सर किसी बड़े नेता की ओर से बेटियों को बचाने या कन्या भ्रूण की हत्या नहीं करने को लेकर गुहार लगाई जाती है, तो कोई सरकार “लाडली” या दूसरी योजनाओं के जरिए इस संकट को दूर करने की कोशिश करती है। लेकिन वे कौन-सी वजहें हैं कि हर अगले अध्ययन या सर्वेक्षण में नतीजे वही आते हैं कि स्त्री-पुरुष अनुपात का फासला बढ़ रहा है और खासतौर पर पॉश कहे जाने वाले इलाकों में बेटियों की तादाद तेजी से कम हो रही है।

कन्या भ्रूणहत्या पर दुख जाहिर करते हुए जब इसकी वजहों पर बात करने की बारी आती है, बात इससे आगे नहीं बढ़ पाती कि बेटियों को कोख में मार देने की असली वजह बेटे की इच्छा और दहेज की समस्या है। लेकिन मेरे लिए अब तक यह समझना मुश्किल रहा है कि बेटा ही वंश चलाएगा, इसलिए बेटी को गर्भ में मार डालने की जरूरत क्यों पड़ती है। मैंने अपने गांव के अलावा कितनी ही जगहों पर ऐसे बेहद गरीब परिवारों को भी देखा है कि बेटे की चाह में दो-चार या छह बेटियां पैदा हो गईं, लेकिन जन्म के पहले या बाद में उनकी हत्या की कोशिश तक नहीं। जाहिर है, दहेज भी अगर किसी के लिए समस्या है तो यही वह वर्ग है, जिसके लिए हजार-दो हजार रुपए भी जीवन-मरण का सवाल होते हैं। बच्चों का भरण-पोषण और ब्याह किसी तरह हो गया, सब अच्छा…! शिक्षा नहीं, जागरूकता नहीं, सोनोग्राफी तक पहुंच नहीं, पैसा नहीं और इस पर यह “विश्वास” भी कि बच्चे भगवान की देन हैं। वजह कोई भी, लेकिन बेटी की हत्या नहीं करेंगे- पैदा होने के पहले या बाद में। हां, कुपोषण, देखभाल, बीमारी या दूसरी वजहों से कोई बच्चियों के मरने की खबरें तल्ख हकीकत जरूर हैं।

“बुरी जगह” में बोझ बेटी

दूसरी ओर, इसी देश के शहरी इलीट- शिक्षित और जागरूक, पैसा कोई समस्या नहीं, स्त्री-पुरुष की बराबरी का झंडाबरदार और आधुनिक होने के तमाम दावे भी। फिर महज एक बेटी के लिए भी जगह क्यों नहीं? ये वे हैं कि अगर कोई बीस मांगे तो चालीस अपनी ओर से उसकी झोली में डाल दें। मगर इनकी “आधुनिकता” क्या इतनी वीभत्स है कि कुलदीपक की चाह में ये गर्भ में ही बेटियों की हत्या कर डालते हैं? ऐसे घरों में अगर बेटी पैदा हो भी जाए तो पढ़ाई-लिखाई से परिवेश के तमाम हालात उसे बालिग होते-होते स्वनिर्भर बना देते हैं। यानी किसी भी हाल में ये अपने मां-बाप के लिए “बोझ” भी नहीं रहतीं। फिर इनके अलावा और क्या वजह हो सकती है कि ये इलीट किसी भी हाल में अपने घर में बेटी नहीं पैदा होने देते या उसकी हत्या कर देते हैं?

यहां संजय दत्त और उनकी बेटी त्रिशला की ताजा बहस इसलिए याद आ रही है, क्योंकि मैं इसे एक “सॉफ्ट” प्रतिनिधि मामले की तरह देखना चाहता हूं। संजय दत्त जानते हैं कि अपनी फिल्मी दुनिया में अपने से आधी उम्र की लड़कियों की कमर पर थाप देते हुए वे उस लड़की को क्या समझते हैं, “उनके समाज” के तमाम पुरुष ऐसी लड़कियों को सिर्फ किस काम आने वाली चीज समझते और उनसे कैसे बरतते हैं; वे जानते हैं कि उनकी फिल्मी दुनिया महिलाओं के लिए बहुत बुरी जगह है; इसलिए वे नहीं चाहते हैं कि उनकी बेटी उन हालात का शिकार बने।

लेकिन बात अगर यहीं खत्म हो जाती तो बात और थी…! संजय दत्त की त्रासदी तब और गहरी हो जाती है जब त्रिशला साफ तौर पर कह देती है कि “अगर मेरे पापा मेरे फैसले से सहमत नहीं हुए तो मेरा रास्ता अलग होगा।” यानी कि अगर संजय दत्त के घर में त्रिशला पैदा हो गई है तो उसका परिवेश उसकी ताकत होगा। वह चाहेगी तो फोरेंसिक वैज्ञानिक बनेगी और चाहेगी तो फिल्मों के परदे पर झूमेगी। संजय दत्त की विडंबना यह है कि उनकी आंखों में स्त्री का “व्यक्ति” नहीं है, सिर्फ उसका नितंब है- वह कोई और हो या फिर अपनी बेटी…!

संजय दत्त तो फिर भी इतने उदार हैं कि उनकी बेटी त्रिशला जिंदा हैं। लेकिन अगर संजय दत्त को यह “ब्रह्म ज्ञान” त्रिशला के जन्म के पहले मिल गया होता तो क्या हुआ होता? खैर, संजय दत्त दया के पात्र हैं और उन्हें माफ किया जा सकता है। लेकिन शायद अब बात खुल रही है।

किसी भी रास्ते जब पैसा जरूरत से ज्यादा आता है, तो उसके जाने के लिए आमतौर पर अय्याशी के ठिकाने ही होते हैं। इस अय्याशी को जीने वाला “पुरुष” अपने गले में “आधुनिक” होने और “जिंदादिली” का पट्टा लटकाए रखता है। वह सेक्स संबंधी तमाम वर्जनाओं से “ऊपर उठ कर” इस मामले में “नवीनतम प्रयोगों” को अपने “आधुनिक” होने का पर्याय मानता है। इस “आधुनिकता” की सबसे अनिवार्य शिकार स्त्री है। और जाहिर है, वह “शिकार” घर की दहलीज से बाहर की स्त्री ही होगी। लेकिन घर में भी जो “त्रिशलाएं” होंगी, उसका क्या हल है? यानी अपनी “इज्जत” को बचाना है तो कुछ करना होगा! बेटी पैदा ही क्यों हो, कि वह अपने भाई-बंधुओं के “नवीनतम प्रयोगों” का शिकार बने! या “त्रिशला” हो जाए! सारी आधुनिकता और प्रगतिशीलता इस एक छोटी-सी ग्रंथि से संचालित और नियंत्रित होती है।

बेटी या बोटी…

हमारी एक दोस्त हैं। उनकी उम्र लगभग पच्चीस साल है। इसी मसले पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि दिल्ली में नौकरी के बीच जब भी वे हरियाणा के एक कस्बे में अपने घर जाती हैं तो उनके पचपन साल के पिता के हमउम्र, लेकिन किसी बांके जवान की तरह सजे-संवरे, इत्र लगाए, हर वक्त पूरी तरह “मेनटेन” दिखने वाले, बहुत धनी-मानी और कई फैक्ट्रियों के मालिक एक दोस्त उनसे मिलने जरूर आते हैं। जहां उनके पिताजी प्रणाम करने पर सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद देते हैं, और फिर बैठ कर या खाते-पीते, हंसते-खेलते बातें होती हैं, वहीं उनके पिता के उस दोस्त के आशीर्वाद देने का तरीका कुछ और ही होता है। वे पांच मिनट में पचास बार “बेटे-बेटे” कहते हैं, छोटी-छोटी बातों पर इतने उत्साहित होकर बेटे-बेटे कहते हुए कंधे या पीठ पर थपकी देते हैं, जैसे उसके आने या आगे बढ़ने से सबसे ज्यादा खुशी उन्हें ही होती हो। गले लगा कर, चूम कर “आशीर्वाद” देना उनका खास तरीका है। पिछली बार तीन दिन में जब दूसरी बार उनके “आशीर्वाद” देते हाथ ने साफ तौर पर वही हरकत की, जिसका इन्हें अंदेशा था, तब इनका धीरज जवाब दे गया और इन्होंने अपनी मां को बताया। मां ने पति के उस दोस्त को ढेर सारी गालियां दीं, और कहा कि इसीलिए अपनी बीवी का गर्भ जांच करा कर चार बार गर्भपात करवाया और एक बेटा पर इतराता फिरता है। पता नहीं अपनी बेटी होती तो क्या करता। शायद इसीलिए बेटी नहीं होने दिया।

(हमारी दोस्त ने जब यह बताया तो मैंने कहा कि आपकी मां ने भले गुस्से में वह बात कही हो, लेकिन शायद उन्होंने आपके बहाने कन्या भ्रूणहत्या के सबसे बड़े कारण पर उंगली रख दी है। बस, हमारे भीतर इतनी हिम्मत पैदा नहीं होती कि इसे किसी वजह के तौर पर स्वीकार करें।)

एक बेहद धनी परिवार में पैसा कोई सवाल नहीं, बेटी बोझ नहीं हो सकती, बल्कि परिवार या खानदान का नाम ही ऊंचा करेगी। तब फिर दूसरी कौन-सी वजह हो सकती है बेटियों को मार देने की?

बेहिसाब अमीरी का एक अनिवार्य रिश्ता अय्याशी से होता है और अय्याशी में स्त्रियों को सिर्फ एक ही निगाह से देखा जाता है। यह निचले वर्गों में भी उतरता है। एक तरफ जड़ सामंती दिमागी ढांचा, तो दूसरी तरफ तथाकथित आधुनिकता और “ब्रॉडमाइंडेडनेस”- दोनों ही स्थितियों में स्त्रियां सिर्फ देह हैं, सेक्स के लिए एक वस्तु! तो इस तरह के “आधुनिक और ब्रॉडमाइंडेड” पिताजी ये कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं कि जो वे दूसरी स्त्रियों के साथ करते हैं, उसी स्थिति का शिकार उनकी बेटी की भी हो। अगर किसी “धोखे” से घर में बेटी आ गई है तो इनकी जीवन शैली में वह किसके रोके रुकेगी? तमाम सुविधाओं के बीच वह पढ़ेगी-लिखेगी, अपनी काबिलियत साबित करके अपने भरोसे जिएगी, और अपनी जिंदगी को अपनी मर्जी से जैसे चाहे, जिसके साथ चाहे जिएगी।

न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी…

लेकिन पितृसत्ता क्या इतनी आसानी से इस तरह की स्त्री सत्ता को स्वीकार कर लेगी? जाहिर है, बेटियों को इन तमाम “दुखों” से मुक्ति दिलाने वाले अमीर पिता इतने “भले मानुष” होते हैं कि इस दुख से निपटने का उनका रास्ता एक ही शेष और सुरक्षित है- न रहेगी बेटी, न उसे ये दिन देखने होंगे…!

अब कोई लाख मुंह चुराए या इनकार करे, अगर कन्या भ्रूणहत्या की समस्या अमीर परिवारों में सबसे गंभीर है तो इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि पितृसत्ता यहां अपने सबसे बर्बर और सड़े-गले स्वरूप में अट्टहास करता है। लेकिन तमाम सरकारी और गैरसरकारी अभियानों से लेकर “सत्यमेव जयते” कन्या भ्रूणहत्या को अमीरों के घर की “शोभा” बताने के बावजूद उसकी वजह के तौर पर सिर्फ दहेज या वंश चलाने के लिए बेटे की चाह को ही क्यों पेश किया जाता है? जबकि इस वर्ग के लिए दहेज कोई समस्या है ही नहीं और बेटा इन्हें अपना वंश चलाने के लिए नहीं, “समाज” को यह दिखाने के लिए चाहिए कि ये “अनुर्वर” नहीं हैं और वह इनकी विरासत अपने पास बनाए रख सके। यह सिलसिला बिना किसी मुश्किल के चलेगा।

उन्हें यह डर दिखाना मनोरंजक है कि जब लड़कियां नहीं रहेंगी तो बीवी कहां से लाओगे या मां-बहन कहां से पाओगे। इनकी सामंती, पितृसत्तात्मक और पुरुष कुंठाओं का हल इनका अकूत पैसा है। पैसा इनकी सभी मुश्किलों को दूर करता है- “अपने समाज” में स्त्रियों की कमी को भी! समाज के “पिछड़े” दिमाग वाले दलित या दूसरी जातियों के लोग तो बेटियों को जन्म देने के लिए हैं ही। जब तक बेटा न हो जाए, चार-पांच हों या छह-सात, बेटियों को गर्भ में नहीं मारेंगे। वे भी “भगवान” की देन हैं। चाहे गरीबी या बदहाली की वजह से बेटियों को मरने के लिए “राम भरोसे” ही क्यों न छोड़ देना पड़े। हरियाणा या पंजाब के पिछड़े हुए दिमाग वाले कुछ धनिकों को पकड़ लिया जाता है कि वे अपने समाज में महिलाओं की कमी के कारण किसी गरीब महिला को खरीद कर लाते हैं और एक परिवार में दो या चार मर्द उससे अपने पुरुषत्व को शांत करते हैं।

यानी इस धनी और इलीट समाज में महिला जिस रूप में है, वहां का कोई भी पुरुष नहीं चाहेगा कि वह जिसे जन्म दे, उसे इन हालात का शिकार होना पड़े।

सामंती कुंठाओं का जाला

शहरी इलीटों के बीच हालात अलग नहीं हैं, बस तरीका जरा “सॉफिस्टिकेटेड” और आभिजात्य हो जाता है। अमेरिका और फ्रांस की किसी गारमेंट कंपनी की सबसे महंगी और आधुनिक वेशभूषा के भीतर वह सड़ता-बजबजाता दिमाग होता है, जिसमें स्त्री की उपयोगिता सिर्फ बिस्तर पर होती है। सामंती कुंठाओं का यही जाला उसकी आंखों पर पड़ा होता है जिसके पार अपनी बेटी को उसी हालत में देखने का डर किसी व्यक्ति को सताता रहता है। इस डर से निजात के उपाय, यानी लिंग जांच और भ्रूणहत्या। जिसे अपनी बेटी इंसान लगेगी, उसे उसके होने का क्या डर होगा? वह अपनी बेटी के दुनिया में आने का स्वागत क्यों नहीं करेगा?

सवाल है कि पैदा होकर बहू या बीवी के रूप में मौजूद औरत कहां खड़ी है इस मामले में? आमिर ब्रांड “सत्यमेव जयते” में जिन महिलाओं को पेश किया गया था, उन्होंने विरोध करने का खमियाजा अपने पति या परिवार की यातनाएं झेल कर उठाया था। इन दो-चार की तादाद में कन्या भ्रूणहत्या का विरोध करने वाली महिलाओं का पलड़ा बराबर भी हो जाए तो तस्वीर बदल जाए। लेकिन पितृसत्ता की साजिशों की बुनियाद पर खड़ी व्यवस्था की कंडिशनिंग के नतीजे में एक पुरुषवादी मनोविज्ञान को जीती स्त्री सामंती कुंठाओं से लैस पुरुष से कुछ अलग नहीं सोच पाती।

दरअसल, यह अलग सोच पाना भी तब संभव हो पाता, जब अपनी बनाई हुई जमीन होती। लेकिन ऐसा नहीं है और इस लिहाज से देखें तो कन्या भ्रूणहत्या की समस्या पुरुष वर्चस्व की मानसिकता में मरती-जीती स्त्री की वजह से भी बनी हुई है। यह अलग बात है कि इसके लिए वे स्त्रियां नहीं, बल्कि व्यवस्था और उसके झंडाबरदार जिम्मेदार है। बिना उसकी परतें उधेड़े और उसे निशाने पर लिए बेटियों की हत्या गर्भ में ही कर देने के कुकर्म से निपटना मुमकिन नहीं होगा।

 

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अरविन्द शेष नई दिल्ली 

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