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समुद्र-यात्रा वर्जन थी, मिथ है – डॉ. कर्ण सिंह

अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय’ के यशस्वी आलोचक प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल के यात्रा-आख्यान ‘हिंदी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान’ का विमोचन 25 नवम्बर की शाम इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में संपन्न हुआ.

राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित ‘हिंदी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान पुस्तक का लोकार्पण अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् के अध्यक्ष डॉ. कर्ण सिंह ने किया. राज्य सभा सदस्य देवी प्रसाद त्रिपाठी, जनसत्ता के संपादक ओम थानवी एवं मन्नू मित्तल ने पुस्तक पर अपने विचार व्यक्त किये. युवा आलोचक रवींद्र त्रिपाठी ने कार्यक्रम का सञ्चालन किया.

लोकार्पण के बाद यात्रा-वृत्तान्त के लेखक प्रो. अग्रवाल ने किताब के चुने हुए अंशों का पाठ किया जिससे स्पष्ट हुआ कि यह वृत्तान्त सर्जनात्मक गद्य का सुन्दर उदाहरण है. लेखक ने इसे लिखने की प्रेरणा, रचना-प्रक्रिया और अनुभवों को भी श्रोताओं से साझा किया. उन्होंने कहा कि यह पुस्तक उन चिंताओं का विस्तार है जो पिछले कई सालों से मुझे सताती रही है. व्यापार जब यूरोप में बढ़ता है तो उसके कारण सामाजिक परिवर्तन होते हैं, औद्योगिक क्रांति होती है, साम्राज्यवाद आता है लेकिन भारत में व्यापार के विकास के बाद भी जडता बनी हुई थी- यह इतिहासबोध मुझे वाजिब नहीं लगता है. इस इतिहासबोध की गुत्थी को सुलझाना भी इस किताब का, इस यात्रा का एक मकसद रहा है और मेरे लेखन की केन्द्रीय चिंता भी रहा है. अगर हम अपने इतिहास पर ध्यान दें तो औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा के कई झूठों से मुक्त हुआ जा सकता है.

डॉ. कर्ण सिंह ने इस किताब की अंतर्राष्ट्रीय उपयोगिता और आवश्यकता को रेखांकित करते हुए इसे अंग्रेजी में अनूदित करने का सुझाव दिया. इस किताब में ‘औपनिवेशिक ज्ञानकांड’ (लेखक के प्रिय पदबंधों में से एक) द्वारा भारत के बारे में रचे गए कई ‘मिथों’ या यूँ कहें कि ‘झूठों’ का पर्दाफाश किया गया है. शायद किताब लिखने के पीछे काम कर रही प्रेरणाओं में से एक प्रबल प्रेरणा यह भी है. भारतीय संस्कृति में समुद्र-यात्रा वर्जित थी- यह एक मिथ भी जरूरत से ज्यादा रचा और फैलाया गया था. इस किताब में इस ‘मिथ’ का खंडन किया गया है. किताब के इस पक्ष पर ध्यान केंद्रित करते हुए डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि औपनिवेशिक सोच के लोगों का यह कहना आश्चर्यजनक है कि भारतीय संस्कृति में समुद्र-यात्रा को वर्जित कार्य माना गया था. उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय संस्कृति का पूर्व में जिस तरह से प्रचार हुआ और जिस तरह से हिंदू और बौद्ध संस्कृति को बाहर स्वीकृति मिली उससे यह बात निराधार साबित होती है. उन्होंने कहा कि प्राचीन भारतीय संस्कृति में ऐसी कोई वर्जना नहीं मिलती है.

पुस्तक में कुल ३९ चित्र भी हैं जिन्हें लेखक ने स्वयं यात्रा के दौरान खींचा था. इसके अतिरिक्त भारत-अस्त्राखान के चार प्रमुख व्यापारिक मार्गों को दर्शाने वाला एक मानचित्र भी है.

डॉ. कर्ण सिंह ने चित्रों की भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा कि ये चित्र न केवल वृत्तान्त को रोचक और प्रामाणिक बनाते हैं बल्कि कला की दृष्टि से भी उम्दा हैं. उन्होंने कहा कि यदि इसमें अस्त्राखान और येरेवान (आरमेनिया की राजधानी) का मानचित्र भी होता तो पाठकों को आख्यान से अपने आपको जोडने में और अधिक सहूलियत होती.

देवी प्रसाद त्रिपाठी ने दर्शन, समाजशास्त्र, इतिहास, धर्मशास्त्र, संस्कृति और साहित्य सभी दृष्टियों से इस किताब को बहुत महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने बल देकर कहा कि विभिन्न अनुशासनों की अंतर्क्रिया इस यात्रा वृत्तान्त को अनोखा बनाती है. भूमिका –‘बयान शुरूआती’ में लेखक ने इस किताब को ‘ट्रेवेलाग’ (यात्रा वृत्तान्त) के साथ-साथ ‘थॉटलाग’ (विचार यात्रा) भी कहा है. इसके आशय को उद्घाटित करते हुए त्रिपाठीजी ने कहा कि यह किताब आज के अस्त्राखान और आरमेनिया की राजधानी के माध्यम से पूर्व संयुक्त रूस के सभी देशों में धर्म और संस्कृति के साथ-साथ व्यापार के विकास का एक महत्पूर्ण पाठ प्रस्तुत करती है. उन्होंने कहा कि यात्रा वृत्तान्त की भाषा वैसी ही प्रवाहमान होनी चाहिये जैसे यात्रा के दौरान यात्री निरंतर चलायमान रहता है. इस अर्थ में किताब का गद्य वैसे ही प्रवाहमान है जैसे नदियाँ होती हैं, जैसे जीवन होता है. यह पुस्तक कई अर्थों में विचारों, विधाओं और विश्लेषणों का संगुम्फन है. “इस अर्थ में यह सिर्फ हिंदी साहित्य में ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में एक अनुपम कृति है. यह पुस्तक भारतीय मानस में व्याप्त सबसे विकट इतिहासबोध को विखंडित करती है.” श्री त्रिपाठी ने कहा, “औपनिवेशिक इतिहासबोध के सबसे विकट कुपरिणामों को किताब सप्रमाण रेखांकित और विखंडित करती है, पाठक को पुनर्विचार की प्रेरणा देती है.”

ओम थानवी ने सरस गद्य के लिए लेखक को बधाई दी. उन्होंने कहा कि इस किताब को पढ़ने के बाद लगता है कि यह साहित्यिक विधाओं के दायरों को तोडती है इसलिए यह एक महत्वपूर्ण रचना है. यह किताब केवल पावों की यात्रा नहीं है बल्कि विचारों की भी है. इसलिए यह एक बड़ी किताब है. ओम थानवी के अनुसार पुरुषोत्तम अग्रवाल ने इस वृत्तान्त में नृतत्वशास्त्र और इतिहास की खोजों का प्रयोग किया है. यह किताब परंपरा और समकालीनता को एक सूत्र में पिरोती है तथा इतिहास के कई पूर्वग्रहों को तोडती है.

पुस्तक का पहला अध्याय- ‘मैं रक्तरंजित अनाथ कवि…..’ येरेवान के कवि येगिशे चारेंत्स पर है. इस अध्याय में आरमीनियाई पेंटर अलेग्जेंडर बाज्ब्यूक मेलिक्यान का बनाया चारेंत्स का स्केच – ‘महात्मा चारेंत्स’ भी शामिल किया गया है. अपने इस स्केच पर चारेंत्स ने लिखा है: “तुम्हारी आत्मा अभी ताक अनुभवरहित है, अभी तक तुम कमजोर हो, चारेंत्स. आत्मा को मजबूत करो. पुजारी, योग्य, सूर्य बनो, जैसे महात्मा गाँधी – प्रतिभाशाली हिन्दुस्तानी…२४.०१.१९३६.” श्री थानवी ने इस मार्मिक पक्ष को उद्घाटित करने के लिए पुरुषोत्तम अग्रवाल की प्रशंसा की और कहा कि यह अंश मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत प्रिय लगा.

जेएनयू की प्रोफेसर मन्नू मित्तल ने कहा कि पुरुषोत्तमजी ने इतना सजीव और जीवंत वर्णन किया है कि पाठक के सामने पूरा चित्र सामने आ जाता है. यह केवल यात्रा वृत्तान्त नहीं है बल्कि शोध भी है. उन्होंने कहा कि व्यापारिक रास्तों की खोज के माध्यम से पुरुषोत्तम जी ने भारत और मध्य एशिया के सांस्कृतिक संबंधों की पड़ताल की है. अस्त्राखान के व्यापारियों के साहसिक जीवन को यह किताब पाठकों के सामने लाती है. मन्नू मित्तल ने कहा कि नवंबर के पहले सप्ताह में जेएनयू में आयोजित सिल्क रूट कांफ्रेंस में इस किताब पर आधारित व्याख्यान बहुत सराहा गया था, अपने काव्यात्मक मुहावरे के साथ ही, इस ऐतिहासिक तथ्य को रेखांकित करने के कारण भी कि सिल्क रूट केवल पश्चिम और पूर्व के बीच नहीं, उत्तर और दक्षिण के बीच भी था; याने भारत ही नहीं अफ्रीका के इतिहास पर भी पश्चिमकेन्द्रित दृष्टि से बाहर निकल कर सोचने की जरूरत है।

ऑडियेंस में नौजवान बड़ी तादाद बल्कि अक्सरियत में थे, यह आज के किसी भी साहित्यिक कार्यक्रम के सम्बन्ध में रेखांकित करने योग्य, सुखद बात है. अक्सर यह बात प्रचारित की जाती है कि हिंदी लेखक लोकप्रिय नहीं हैं, और साहित्यिक कृतियों में युवा पीढ़ी की रूचि तेजी से घट रही है. इस कार्यक्रम में युवाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी यह साबित करती है कि हिंदी के लेखक लोकप्रिय भी हैं और युवाओं की साहित्य और गंभीर विमर्श में रूचि भी कम नहीं है. इसके अतिरिक्त अजितकुमार, अर्चना वर्मा, मनीषा कुलश्रेष्ठ, दिबांग, पंकज पचौरी, प्रियदर्शन, सुरेश नेवटिया, प्रकाश रे व राजधानी के तमाम गणमान्य बुद्धिजीवी, साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, प्राध्यापक और पत्रकार बड़ी संख्या में मौजूद थे.

रिपोर्ट – आनंद पांडे  | तस्वीरें – भरत तिवारी

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This entry was posted on November 30, 2012 by in पुस्तक, प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल, रचनाकार, लोकार्पण, हिंदी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान and tagged , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , .

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